जाति जनगणना बनाम आर्थिक जनगणना।

जाति जनगणना बनाम आर्थिक जनगणना

जब तक भारत में जातिवाद फलेगा तब तक हिंदुस्तान के अखंड भारतवर्ष की कल्पना साकार नही हो सकती-आरएसएस

देश मे इन दिनों जाति जनगणना को लेकर विभिन्न क्षेत्रीय पार्टियों ने जोर पकड़ा है। इसमें कोई शक नही की ये अपने अपने राजनीतिक फायदे और आने वाले विभिन्न महत्वपूर्ण राज्यों के विधानसभा चुनावों के लेकर किया जा रहा पार्टियों का व्यक्तिगत प्रयास है। मैंने व्यक्तिगत शब्द का प्रयोग इसलिए किया क्योंकि राजनीतिक पार्टियों को इस जातिगत जनगणना के मुद्दे से व्यक्तिगत फायदा है न कि देश या जनता का। जातिगत जनगणना की मांग वो कर रहे हैं जिन्होंने लगभग 30 वर्षों से ज्यादा सत्ता में रहकर अपनी जाति या वर्ग का राजनीतिक दोहन किया है। आजादी के 75 वर्षों बाद भी विश्व के विकासशील देशों में भारत 90 वें स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत 2020 के मानव विकास सूचकांक में 189 देशों में एक स्थान गिरकर 131 पर आ गया है। जातिगत जनगणना को लेकर देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत संगठनों और व्यक्तियों का विरोध भी सामने है उनका मानना है कि अब देश से आरक्षण खत्म होना चाहिए। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने भी आरक्षण को देश में 50 वर्षों बाद खत्म करने की वकालत की थी खैर बुजुर्गों ने भी कहा है एक सीमा बाद किसी विषय या वस्तु की अति बुरा प्रभाव डालती है। गीता में कृष्ण ने भी कहा है कि परिवर्तन संसार का नियम है और नियमों का पालन करना ही धर्म है।
भारत तो विभन्नताओं में एकता का परिचायक है। इसे बनाये रखने की जिम्मेवारी सरकार और जनमानस सभी की है। जनगणना की बात करें तो आर्थिक जनगणना की वकालत कर रहे लोगों का पक्ष जातिगत जनगणना की मांग कर रहे लोगों की अपेक्षा ज्यादा मजबूत है। आज प्रत्येक वर्ग के विभिन्न जातियों में गरीब और अति गरीब हैं जिन्हें सरकार की योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए। जनगणना का विषय किस पार्टी के लिए फायदेमंद है उससे बेहतर है कि जनता के बारे में भी सोचना चाहिए और जनता को भी इसके बारे में सोचना चाहिए। जातिगत जनगणना के आधार पर योजना बनाने की जगह सरकार को आर्थिक जनगणना के आधार पर योजना बनाना चाहिए हालाँकि वर्तमान केंद्र सरकार ने सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास स्लोगन के साथ उज्वला योजना, उजाला योजना, प्रधानमंत्री आवास, शौचालय आदि दर्जनों योजनाएं सिर्फ आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को ध्यान रख बनाई गई हैं न कि जाति आधारित है। आरएसएस कहता है कि एक कटु सत्य यह भी है “जब तक भारत में जातिवाद फलेगा तब तक हिंदुस्तान के अखंड भारतवर्ष की कल्पना साकार नही हो सकती।” जातीय राजनीति से समाज मे कटुता का प्रसार होता है। यदि हम सनातन वैदिक काल की बात करें तो उस समय कर्म के आधार पर जातियाँ तय होती थी। जो वंशानुगत कभी नही रही और प्राचीन भारत अर्थात आक्रांताओं के आक्रमण और शासन से पहले भी सभी जातियों के शासन का विवरण इतिहास में मिलता है उदाहरण स्वरूप मौर्य वंश, गुप्त वंश, पाल वंश, गुर्जर वंश, चोल वंश, जैसवार वंश, अहीर वंश आदि। विदेशी आक्रांताओं और भारत मे विदेशी शासन की बात करें तो भारत लगभग 3 हजार वर्ष तक गुलाम रहा जिनमें तुग़लक वंश, लोदी वंश, गुलाम वंश, मुगल वंश और ब्रिटिश हुकूमत आदि। विदेशी आक्रांताओं और विदेशी शासन के दौरान उनके द्वारा बनाये गए कानूनों, नियमों एवं उनकी सभ्यताओं, संस्कृति के जबरन थोपे गए प्रभाववश हमारी सनातन वसुधैव कुम्बकम, सर्वधर्म समभाव वाली संस्कृति एवं सभ्यता का ह्रास हुआ और जातियां कर्म के आधार पर नही बल्कि समय काल परिस्थिति अनुसार वंशानुगत हो गई। जाति हीनता, जातीय कटुता को समाप्त कर हमें सामाजिक समरसता के लिए काम करना होगा। तमाम ऐसे सामाजिक व्यक्ति और संगठन इसमें महती भूमिका अदा कर सकते हैं आजादी के अमृत महोत्सव को जब हम मना रहे हो तब समाज में व्याप्त जातिवाद रूपी विष का पान किसी न किसी रूप में करना होगा चूंकि यह भी ध्यान रखना होगा कि विष कही समाज मे व्याप्त न हो जाये।
वैदिक काल के बारे में किये गए शोध जनमानस तक पहुंचाना होगा उदाहरण स्वरूप ब्रम्हर्षि विश्वामित्र के पिता क्षत्रिय और माता ब्रम्हाणी थी, भगवान परशुराम के पिता ब्राह्मण और माता क्षत्राणी थी, परमज्ञानी रावण के पिता ब्राह्मण और माता राक्षस कुल की थी, महर्षि बाल्मीकि के पिता निषाद और माता ब्राह्मणी थी आदि। शोध के परिणाम स्वरूप समाज में पड़ी जातिगत खाई को पाटा जा सकता है। यदि जाति वंशानुगत है तो उसके कर्म भी वंशानुगत होने चाहिए किन्तु वैदिक और आज आजादी के बाद से सभी को पूर्ण रूप से अपने कर्मों के चयन की स्वतंत्रता है। बीच के 3हजार वर्षों के गुलाम भारत के दौरान जातिगत मनः स्थिति कटुता पूर्ण और शारीरिक और मानसिक दोहन से असमानता एवं हीन भावना के बृहद स्वरूप में परिवर्तित हो गई। आज का राजनीतिक परिदृश्य भी उसी 3 हजार वर्षों के गुलाम काल खंड के जाति विशेष के दोहन के मुद्दे पर देश की प्रभुता और अखंडता से खेलता चला आ रहा है। इस पर एक पंक्ति है मेरी रचित की-
“ईर्ष्या और द्वेष छोड़, अनुसरण बुद्ध के ज्ञान का।
अमर भारती है तू, अखंड भारत महान का।।
आज के धर्मावलंबियों को अपने धर्म का पूर्ण ज्ञान या सततत्व का बोध ही नही है वह सिर्फ धर्म के नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए सिर्फ उसके साम, दाम, दंड, भेद सभी विधाओं के माध्यम से प्रचार प्रसार में लगे हैं। यह भी एक प्रकार से जातियों के आपस मे मतभेद और मनभेद का कारण हो सकता है।
अंग्रेजी शासन काल 1931और 1941 में पहली बार जातिगत जनगणना हुई फिर आजादी के बाद 1951 में सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजाति की ही जनगणना हुई। पिछडो की जनगणना की मांग को देखते हुए 1953 में काका कालेलकर आयोग बनाया गया। एससी एवं एसटी के आरक्षण को देखते हुए लगातार उपेक्षित पिछडो के लिए 1978 में बीपी मंडल की अध्यक्षता में मंडल ओबीसी आयोग बनाया गया। अन्तोगत्वा 1990 में प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर दी। ओबीसी को नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण दिया गया जिसे अधिकतम 50 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। इस ओबीसी आरक्षण के विरोध में देशभर में हो रहे प्रदर्शन के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इसे सही ठहराया। 2006 में पुनः मंडल पार्ट 2 आया और यह भी पारित हो गया जिससे ओबीसी को नौकरियों के साथ शिक्षण संस्थानों और विभागों में भी आरक्षण मिलना शुरू हुआ। 2011 में प्रणव मुखर्जी की अगुवाई में सोशियो इकॉनोमिक एंड कास्ट सेंसस नाम से 4800 करोड़ के खर्च से पुनः जनगणना हुई। अब 2021 में क्षेत्रीय पार्टियाँ नीतीश कुमार की अगुवाई में पुनः जाति आधारित जनगणना की मांग कर रही हैं।
जेएनयू में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे वेलेरियन रोड्रिग्स अंग्रेजी अखबार द हिन्दू में लिखते हैं कि
“जाति जनगणना आज की जरूरत है। जाति जनगणना का उद्देश्य केवल आरक्षण के मुद्दे तक सीमित नहीं है। जाति जनगणना वास्तव में बड़ी संख्या में उन मुद्दों को सामने लाएगी, जिन पर किसी भी लोकतांत्रिक देश को ध्यान देने की जरूरत है. मसलन हाशिये पर रहने वाले लोगों की संख्या कितनी है। यह जानकारी किसी भी लोकतांत्रिक नीति निर्माण के लिए जरूरी है।”

देवब्रत त्रिपाठी’देव’
(साहित्यकार एवं स्तंभकार)

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